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कविता - खिड़की by Pawan Singh Sikarwar

कविता - खिड़की
एक दिन मेने, अपनी खिड़की खोली
ठंडी हवाओं का शोर था....2
मेरी सामने वाली खिड़की में भी चाँद सा एक चकोर था।
में मुस्करा रहा था,
वो शरमा रही थी ..2
में अपने आप को सुलझा रहा था,
 वो अपने चेहरे पर आ रही झुलफो को सुलझा रही थी
मेरा दिल भी अब इश्क़- ए- दिले चोर था... 2
मेरी सामने वाली खिड़की में भी चांद से एक चकोर था.....2
में उसे देखता रहा
और वो नजरें फेरती रही...2
इश्क़ का महजब आंखों ही आंखों में तोलती रही....1
वो मेरी ईद ओर में उसका दीवाली वाला माहौल था.....2
मेरी सामने वाली खिड़की में चाँद सा एक चकोर था
आखिर में उसने हां कर दी,
जिंदगी की एक नई शुरुआत कर दी
अकेली जिंदगी में बहार कर दी, मोहब्बत से मेरी मुलाकात कर दी।
वो मेरी दिल्ली और में उसका इंदौर था
मेरी सामने वाली खिड़की में चाँद सा एक चकोर था।
By Author Pawan Singh

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कविता - वाह जनाब क्या शायरी थी wrote by Author Pawan Sikarwar

कविता – वाह जनाब क्या शायरी थी ।
 लेखक - पवन सिंह सिकरवार

ये इश्क़ नही था उसका
ये तो उसकी अख़्तियारी थी
कागज पर लिखे मैने उल्टे सीधे शब्द
लोगो ने कहा वाह जनाब
क्या शायरी थी .....२

मोहब्बत का पर्दा
अब बेपर्दा हो गया
बिन आग के लगी
वो चिंगारी थी
अब कैसे करूँ बयाँ अपना दर्द
मोहब्बत सी लगने वाली
ये कोई उम्रदराज बीमारी थी
कागज पर लिखे मैने उल्टे सीधे शब्द
लोगो ने कहा वाह जनाब
 क्या शायरी थी....३

कृष्ण रंग की मृग थी वो
या वो राधा नाम सी प्यारी थी
शायरी सी सच्ची थी वो
और कविताओं सी संस्कारी थी
कागज पर लिखे मैने उल्टे सीधे शब्द
लोगो ने कहा वाह जनाब
क्या शायरी थी.....४

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Author Pawan Singh Sikarwar